डॉ o दिलीप कुमार झा पत्रकार न्यूज ,गोड्डा , झारखंड दिनांक 29/1/ 20260 गोड्डा । पुलिस विभाग राज्य और देश के प्रशासन तंत्र की रीढ...
डॉ o दिलीप कुमार झा पत्रकार न्यूज ,गोड्डा , झारखंड
दिनांक 29/1/ 20260
गोड्डा । पुलिस विभाग राज्य और देश के प्रशासन तंत्र की रीढ़ है इसमें कोई शक नहीं । 24घंटे मुस्तैद रहकर आम जनता की सुरक्षा और कानूनी प्रक्रिया अपना कर क्षेत्र में शांति व्यवस्था कायम करना उनका दायित्व है ।समस्याएं अनेक हैं लेकिन समाधान कर्ता सिर्फ पुलिस होती है न्यायालय में आरोप पत्र समर्पित कर साक्ष्य और गवाहों के कानूनी धाराओं के आधार पर अपना पक्ष मजबूती से रखना और आरोपी को अपराधी बना कर गिरफ्तार कर न्यायालय से सजा दिलाना सबसे अहम और मुख्य कार्य होता है ।समाज में समस्याओं की कमी नहीं है हर पल क्षेत्र में घटनाएं घटती हैं अपराध होता है तत्काल पुलिस की सहायता की आवश्यकता होती हैं । किसी घटना की जानकारी मिलते ही सबसे पहले पुलिस बल एक अच्छे पुलिस अधिकारी के नेतृत्व में अपने उच्च अधिकारियों को सूचना देते हुए घटनास्थल पर पहुंच कर जांच और कार्रवाई करती है ।किसी अपराध पर किसी जगह जमीन के विवाद पर ,दबंगई और गुंडागर्दी पर औरतों के अत्याचार शोषण पर किसी की पत्नी भाग जाती है किसी के घर से बहन और बेटी फरार हो जाती है या अपहृत कर ली जाती है किसी बच्चे का अपहरण कर लिया जाता है नियम और कानून का पालन कराना सड़क हो या दंगा फसाद धार्मिक जुलूस हो या राजनीतिक विरोध सभी को नियंत्रित करना साथ ही उच्च पदाधिकारी की सुरक्षा,माननीय जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा का भार पुलिस पर ही होता है ।
लेकिन पुलिस अधिकारी और जवान जितनी तन्मयता से अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हैं और अपराध का उद्भेदन कर अपराधियों को सजा दिलाते हैं ये उनका दायित्व तो है लेकिन इस विशेष कार्य की सफलता पर उन्हें मिलता क्या है ? वो भी नौकरी करते हैं लेकिन क्या उनके सफलता की गारंटी क्या जरूरी है ? लेकिन घटनाओं के रहस्य से पर्दा उठाकर कांड का निष्पादन करना एक चुनौती होती है ।कर्तव्य के प्रति समर्पण संवेदन और क्रियाशील होना उन्हें विशेष बनाती है ।
झारखंड सरकार हो या कोई अन्य राज्य सरकार अपने अधिकारियों का ध्यान रखते हैं ? झारखंड राज्य में ही 40 के लगभग डीएसपी के पद पर प्रशिक्षण प्राप्त कर दो साल से प्रशिक्षु बने हुए हैं लेकिन उन्हें प्रोन्नति नहीं मिल पाई है और वो प्रशिक्षण की समय सीमां खत्म कर पदोन्नति की आशा में बैठे हैं उन्हें कभी किसी थाना या मुख्यालय में पदस्थापित कर छोड़ दिया गया है और अपने उच्चाधिका रियों के आदेश का पालन करते हैं और कई घटनाओं में S I Tजांच टीम का नेतृत्व कर घटनाओं की जांच कर अपराधियों को पकड़ते हैं और सजा दिलवाते हैं ।अब उनकी मनःस्थिति को समझें प्रशिक्षण प्राप्त हुए एक साल से ज्यादा हो चुके और उसके बाद कई आपराधिक घटनाओं का उद्भेदन भी कर चुके होते हैं लेकिन फिर भी उनके पदनाम में प्रशिक्षु लगा होता है ।उच्चाधिकारी खुश होकर उन्हें प्रशस्ति पत्र और कुछ इनाम की राशि उन्हें दे सकते हैं लेकिन वास्तव में वे जिसके हकदार हैं वो नहीं मिलने से उनमें एक मानसिक कुंठा हो जाती है और अपने मन को मार कर कार्य संपादित करते रहते हैं ।
यही हाल अन्य कनीय पुलिस अधिकारियों और जवानों पर भी लागू होते हैं । जिनके कंधे पर खुद उनकी सुरक्षा अधिकारियों की सुरक्षा , जनप्रतिनिधियों और जनता की सुरक्षा का भार हो सौर वो सारी शर्तों को का निर्वाह करते हुए भी उनका हक और अधिकार न मिले तो उनका मनोबल कभी बढ़ नहीं सकता । ऐसे में राज्य सरकारों का ये कर्तव्य बनता है कि सही समय पर उन्हें उनके पद और अधिकार मिले ।
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