डॉ o दिलीप कुमार झा पत्रकार ,गोड्डा झारखंड । दिनांक 7/7/2026 देश में बढ़ती हुई आत्महत्याओं पर गौर करें तो ये युवाओं में बड़ी त...
डॉ o दिलीप कुमार झा पत्रकार ,गोड्डा झारखंड ।
दिनांक 7/7/2026
देश में बढ़ती हुई आत्महत्याओं पर गौर करें तो ये युवाओं में बड़ी तेजी से ये मानसिक विकृत बड़ी तेजी से फैल रही है । रिश्तों में आई दरारें ,दहेज हत्या तो अब नाम के रह गए लेकिन इसका उपयोग वर पक्ष के लोगों को फसाने के लिए सबसे मनपसंद और नंबर वन अभियोग लगता है जिसमें घर के सारे रिश्तेदारों को लपेट कर जेल की हवा खिलाई जा सकती है और ज्यादातर मामलों में यही होता है ।जिसमें लड़के को मानसिक आघात लगता है और अपनी वजह से मां बाप भाई बहन जो निर्दोष होते हुए भी जेल चले जाते हैं । इसके लिए स्वयं को दोषी मानकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं ।
दूसरी सबसे बड़ी वजह है हताशा और निराशा जब उस युवक को सड़ी गली जर्जर सिस्टम के खिलाफ संघर्ष करना पड़ता है जिसमें वो अकेला लड़ता है और सिस्टम से हार जाता है और निराश होकर प्रशासन से बगावत कर लेता है या फिर विद्रोही बनकर बनकर बंदूकें उठा लेता है या फिर एक ही रास्ता बचता है वो है आत्महत्या ।
कानून के मुताबिक अगर दोषियों को उसके अपराध की सजा नहीं मिल पाती है चाहे वो जांच सही तरीके से नहीं की गई और दोषी हीरो बनकर घूम रहा होता है और पीड़ित पक्ष लड़का हो या लड़की या अन्य लोग तो उसकी क्रोधाग्नि और बदले की भावना कभी खत्म नहीं होती मार देना या खुद मर जाना ही उसका उद्देश्य होता है । क्योंकि उसके साथ अत्याचार हुआ और जहां से उसे न्याय की उम्मीद थी वहां से उसे निराशा मिली और दुबारा उसे शोषण का शिकार बनना पड़ता है जिसमें पुलिस प्रशासन की कभी कभी निष्क्रियता के चलते ये स्थिति उत्पन्न होती है और उसका फल होता है विवशता और आत्म हत्या या इनकाउंटर ।
आर्थिक कठिनाई की वजह । से कमजोर होना लेकिन बड़े बड़े ख्वाब संजोए विलासिता पूर्ण जीवन जीने की तमन्ना में असफलता हाथ लगना ,प्यार प्रेम और विवाह में आ रही आर्थिक कठिनाइयां बड़े बड़े मजनुओं के हिम्मत और प्यार को तोड़ देती हैं और इन परिस्थितियों का सामना न कर पाने की वजह से भी दोहरी आत्म हत्याएं होती हैं । अब अन्य वजहों पर एक नजर डालते हैं
बुजुर्ग अपनी उपेक्षा ,कर्ज के दलदल में आकंठ फंसे हुए ,चरित्र पर दाग या सामाजिक प्रतिष्ठा हनन होने का डर ,जीवन में आ रही चारों ओर से कठिनाइयां ,शारीरिक अक्षमता ,मानसिक प्रताड़ना से बीमार लोग भी कोशिश करते हैं और इस दुनिया में क्या रखा है कुछ नहीं रखा है चलो चलते हैं ? जब जीने का उद्देश्य और मकसद खत्म हो जाता है तो फिर ये जिंदगी एक बोझ बन जाती है ।
लेकिन जीने वाले संघर्ष करते हैं कठिन रास्तों को तय करते है देश राज्य और समाज के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकते हैं समाज कल्याण गरीबों के हक के लिए अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैं और इस उद्देश्य की प्राप्ति में अगर मर खप भी जाते हैं तो आने वाली पीढ़ियां उसे अवश्य याद रखेगी ।
यह लेखक के अपने निजी विचार है।
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