21 अक्टूबर 2026 इंद्र यादव/मुंबई/ दोस्तों,सूरत की टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी इंडस्ट्री में काम करने वाले यूपी-बिहार के मजदूरों ने ...
21 अक्टूबर 2026
इंद्र यादव/मुंबई/ दोस्तों,सूरत की टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी इंडस्ट्री में काम करने वाले यूपी-बिहार के मजदूरों ने अब सीधा फैसला ले लिया है—‘गाँव चलो’! खबर यह है कि करीब 10 लाख प्रवासी मजदूरों के पलायन और आंदोलन की चर्चा जोरों पर है। हालाँकि News18 जैसी रिपोर्ट्स साफ कहती हैं कि यह 10 लाख वाला आँकड़ा मजदूरों के आंदोलन और चर्चाओं से जुड़ा एक दावा है, जिसकी आधिकारिक और स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हुई कि इतने लोग सच में काम छोड़कर घर लौट गए हैं। लेकिन दावा सही हो या अधूरा, सच्चाई यह है कि सूरत की फैक्ट्रियों में मजदूरों का गुस्सा अब फूटने लगा है।
सूरत में काम कर रहे भदोही (उत्तर प्रदेश) के निवासी बसंत यादव ने जो बताया, वो सुनकर किसी भी इंसान का खून खौल जाए। मजदूरों से 12 घंटे की ड्यूटी करवाई जा रही है, जबकि नियम साफ है—8 घंटे। रविवार की साप्ताहिक छुट्टी? सपने में भी मत माँगना। वेतन? ₹15,000 से ₹18,000 के बीच। और अगर किसी ने छुट्टी माँग ली तो सैलरी काटने में मालिक एक सेकंड भी देर नहीं लगाते। यानी काम करो, थको, चुप रहो... वरना पगार में सेंध लग जाएगी।
ये मजदूर यूपी-बिहार से आकर सूरत की मिलों में पसीना बहा रहे हैं। कपड़े बन रहे हैं, एम्ब्रॉयडरी हो रही है, मालिकों के बैंक बैलेंस मोटे हो रहे हैं, लेकिन मजदूरों को न आठ घंटे का हक मिल रहा है, न छुट्टी का, न सही वेतन का। जब तक मजदूर चुपचाप काम करते रहे, सब ठीक था। जैसे ही उन्होंने ‘गाँव चलो’ का नारा लगाया, तो अचानक चर्चा शुरू हो गई।
और सरकार? सरकार तो जैसे इस पूरे मामूले से अनजान है। मजदूर कानून की किताबें अलमारी में धूल खा रही हैं। 8 घंटे की ड्यूटी का नियम सिर्फ कागजों पर है। साप्ताहिक छुट्टी का प्रावधान सिर्फ भाषणों में सुनाई देता है। कम वेतन और छुट्टी पर कटौती जैसी शिकायतें रोज आ रही हैं, लेकिन कोई अफसर, कोई मंत्री, कोई विभाग आगे बढ़कर जाँच करने को तैयार नहीं दिख रहा। सूरत की मिलों में मजदूर तड़प रहे हैं, और दिल्ली-गांधीनगर की कुर्सियाँ आराम से हिल रही हैं।
ये वही सरकार है जो हर चुनाव में गरीबों, मजदूरों, प्रवासियों के नाम पर वोट माँगती है। ‘मेहनतकशों के हित में’ नारे लगते हैं, योजनाएँ घोषित होती हैं, लेकिन जब असली मजदूर सड़क पर उतरते हैं या घर लौटने लगते हैं, तो सरकार का मुँह बंद हो जाता है। जैसे कोई समस्या ही नहीं है। 10 लाख का आँकड़ा सही हो या न हो, लेकिन एक भी मजदूर अगर अन्याय सहकर घर लौट रहा है, तो वो सरकार की नाकामी है।
सूरत की चमक-दमक वाली टेक्सटाइल इंडस्ट्री की असली तस्वीर अब सामने आ रही है। एक तरफ फैशन, निर्यात और मुनाफा, दूसरी तरफ 12 घंटे की गुलामी, कटी हुई सैलरी और बिना छुट्टी का जीवन। मजदूर अब बोल रहे हैं—‘अब और नहीं’। गाँव चलो अभियान सिर्फ पलायन नहीं, विरोध है। विरोध उस व्यवस्था का जो मजदूर को सिर्फ मशीन समझती है।
सरकार अगर अब भी आँखें बंद रखेगी तो सूरत की मिलें खाली होती जाएँगी। और तब न तो उत्पादन बचेगा, न मुनाफा। लेकिन तब तक मजदूर घर पहुँच चुके होंगे... और सरकार को फिर से कोई नया ‘रोजगार मेला’ लगाना पड़ेगा। सवाल सिर्फ इतना है—क्या सरकार मजदूरों की आवाज सुनने वाली है, या सिर्फ आँकड़ों के खेल में मस्त रहेगी!
सूरत के मजदूर इंतजार नहीं कर रहे। वे अपना फैसला खुद ले रहे हैं। अब गेंद सरकार के पाले में है।
क्या करेगी! या फिर हमेशा की तरह... चुप रहेगी!
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