डा o दिलीप कुमार झा वारिष्ट पत्रकार ,झारखंड । दिनांक —7/9/2026 लोकतंत्र आम जनता के सुख सुविधाओं के लिए बनाए गए हैं अंग्रेजों ...
डा o दिलीप कुमार झा वारिष्ट पत्रकार ,झारखंड ।
दिनांक —7/9/2026
लोकतंत्र आम जनता के सुख सुविधाओं के लिए बनाए गए हैं अंग्रेजों के लिए नही जो इस देश की जनता से टैक्स वसूल कर खुद ऐश मौज करते थे लेकिन देश तो अब स्वतंत्र है पिछले 75 वर्षों से आज हमारे देश के जनप्रतिनिधि ही सत्ता का संचालन लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में 5वर्षों के लिए जनता के द्वारा चुने जाते हैं सेवानिवृति के बाद (जो कि होना नही चाहिए वो नौकरी नहीं जनसेवा करते हैं) उन्हें पेंशन लेने का हक मिलना चाहिए क्या? वो भी 75000रुपए मासिक पेंशन ? सुविधाओं के साथ ।
और जो उन्हें चुनकर भेजते हैं बुजुर्ग जिनकी कभी नौकरी नहीं लगी पेट पालने पड़े बच्चों के पूरे परिवार का भरण पोषण करते हुए अपने भविष्य के लिए न एक एल आई सी की एक पॉलिसी तक नहीं ले पाए बेटियों की शादी करते करते उन पर तो अपने श्राद्ध के लिए भी पैसे नही रहे थोड़ी बहुत जमीन बेटों ने बांट ली कुछ जरूरतें पूरा करने के लिए खुद बेच दी ,आज उनलोगों के पास न खेती है न जमीन । उम्र 60 से ऊपर जो बुजुर्ग की श्रेणी में आते हैं । पुरुष और महिला अगर वृद्ध दंपती जिंदा हो तो पुरुष 65 वर्ष महिला 60 वर्ष की हो जाती हैं ये किस तरह जिंदा हैं सरकार को इसकी कोई खबर भी नहीं और न इसकी चिंता है ।जबकि इस उम्र में चिकित्सा की सबसे जरूरत उन्हे पड़ती है ये खर्च सालाना 60,000 कम से कम है सिर्फ दवाई की खर्चा ।सरकार देती है 1000रुपया प्रतिमाह एक भीख मांगने वाला भिखमंगा प्रतिदिन 100से 200रुपया जमा कर लेता है उससे भी कम आय हमारे देश के बुजुर्गों के लिए निश्चित की गई है 1000रुपए प्रतिमाह । जबकि आज 1100 में एक गैस सिलेंडर आता है दूध 60रुपए किलो 1800रुपए प्रतिमाह, बिजली बिल में लूट का सिलसिला जारी है ,200 यूनिट राज्य सरकार द्वारा फ्री देने की घोषणा के बाद भी । सिर्फ आपके बिल में राशि का उल्लेख रहता है जिसे जमा करने का आदेश रहता है । 300/400 पहले के बिल आते थे आज 1200 सौ 1300 आते हैं ।
एक एमएलए और सांसद 5वर्ष में इतना धन इक्कठा कर लेते हैं की उनकी दुबारा चुनाव में खर्च के लिए करोड़ों रुपए होते हैं या नहीं भी चुनाव लडेंगे तो उन्हें हर माह 75000रुपए पेंशन मिलते हैं जो उनके पूरे परिवार के खर्च से भी अधिक है ।लेकिन एक बुजुर्ग को 1000रुपए आखिर किस मापदंड के आधार पर उन्हें सरकार देती है ।उस मापदंड का आधार क्या है ? न इसमें कोई न्याय है न न्याय का कोई आधार ।आज के युग में जिंदा रहने के लिए कम से कम 10,000रुपए प्रति व्यक्ति खर्च है वो भी बगैर शानो शौकत के ।
सरकार मूर्तियों पर करोड़ों खर्च करती है ,सरकारी आयोजनों में खर्च करती है जो टेंट शामियाने बाजे वाले लूट कर ले जाते हैं । बुजुर्गों को बैठकर खाना नही चाहिए उनके लिए भी सरकार कार्य की गारंटी दे ।लड़कियां ,महिलाओं ,नारी सशक्तिकरण, महिला आयोग ,जन प्रति निधि बनाने आगे बढ़ने में सरकार अरबों खर्च कर रही है जबकि कांग्रेस शासन में दी जाने वाली रेलवे में यात्रा पर 33% की छूट दी जाती थी उसे भी मोदी सरकार ने वापस ले ली । जिसने अपनी कमाई से एक मकान बना लिया है तो उसे भी आर्थिक सहायता देने की कोई योजना तो हो लेकिन ऐसी कोई योजना की न चर्चा हुई न कोई योजना है। 5 किलो राशन दी जा रही है जिसे सिर्फ पकाने में 1100की सबको सिलेंडर लगती है ।
क्या इन बुजुर्गों के लिए सरकार के पास कोई योजना है या चिंता है ।
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